बहू को सबसे पहले एक इंसान तो मानो : कुक्कू द्विवेदी
- June 10, 2026
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-मशहूर एवं समर्पित समाजसेविका कुक्कू द्विवेदी ने सामाजिक परिदृश्य पर साझा किए अपने महत्वपूर्ण विचार Jagrat Times, Kanpur/ “नोएडा की ट्विशा शर्मा का मामला केवल एक परिवार की
-मशहूर एवं समर्पित समाजसेविका कुक्कू द्विवेदी ने सामाजिक परिदृश्य पर साझा किए अपने महत्वपूर्ण विचार
Jagrat Times, Kanpur/ “नोएडा की ट्विशा शर्मा का मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उन सभी परिवारों के लिए एक चेतावनी है जहाँ रिश्तों में संवाद की जगह अहंकार, सम्मान की जगह नियंत्रण और प्रेम की जगह दबाव ले लेता है।”
परिवार ऐसा होना चाहिए जहाँ आकर शांति, सुख और संतोष मिले। विडंबना यह है कि अक्सर परिवार में ही लोग एक-दूसरे को सही तरह से समझ नहीं पाते।
जब एक परिवार में दूसरा परिवार जुड़ता है, तो लड़की एक अलग परिवेश में पली-बढ़ी होती है और लड़का अलग माहौल में। अगर दोनों के बीच एक-दूसरे के लिए स्वीकार्यता और प्रेम हो, तो वे एक-दूसरे की अच्छाइयों और कमियों सहित एक-दूसरे को अपना लेते हैं। जब पति-पत्नी का रिश्ता मजबूत होता है, तो तीसरा व्यक्ति उसे आसानी से प्रभावित नहीं कर सकता।
आजकल लड़कियों की शादी देर से होती है। उनका अपना व्यक्तित्व और अस्तित्व होता है, और वे अपने अधिकारों के प्रति भी सजग रहती हैं। इसलिए पहले की तरह उन्हें पूरी तरह बदल देना संभव नहीं है। ससुराल वालों की भी बहू से अपेक्षाएँ कम होनी चाहिए और उसे समय देना चाहिए, ताकि वह घर और परिवार के लोगों को समझ सके।बहू को बेटी मानो या न मानो, लेकिन सबसे पहले उसे एक इंसान तो मानो।
साथ ही लड़कियों को भी यह समझना होगा कि बेटा अपनी माँ को एकदम से छोड़ नहीं पाता। उसकी माँ को उससे अलग करके कोई रिश्ता मजबूत नहीं बन सकता। बेटे को भी माँ और पत्नी के बीच संतुलन बनाना आना चाहिए।
रिश्तों से पहले एक इंसान के रूप में एक-दूसरे को समझना और देखना बहुत ज़रूरी है।
हाल ही में नोएडा की रहने वाली ट्विशा शर्मा का मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बना। ट्विशा की शादी भोपाल में हुई थी और उनकी संदिग्ध मृत्यु के बाद उनके परिवार ने दहेज उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और हत्या के गंभीर आरोप लगाए। मामले की संवेदनशीलता और बढ़ते जनदबाव को देखते हुए जाँच Central Bureau of Investigation को सौंपी गई। हाल ही में ट्विशा की सास, पूर्व जिला न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को भी सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। हालांकि मामले की जाँच अभी जारी है और अंतिम सत्य न्यायालय एवं जाँच एजेंसियों की प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
ऐसे मामले हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि जब रिश्तों में संवाद खत्म हो जाता है, सम्मान कम हो जाता है और मानसिक दबाव बढ़ जाता है, तब उसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं। कोई भी रिश्ता इतना बड़ा नहीं हो सकता कि उसमें किसी व्यक्ति की गरिमा, मानसिक शांति और सुरक्षा ही खत्म हो जाए।
और जहाँ तक समाज की बात है — आखिर किस समाज के लिए सब कुछ सहा जाए? अगर किसी रिश्ते में लगातार अशांति, अपमान और दुख हो, तो शांति से अलग हो जाना कई बार बेहतर होता है।
अपनी समस्याएँ सही व्यक्ति से साझा करना भी बहुत ज़रूरी है। चाहे लड़का हो या लड़की, किसी को भी अत्याचार नहीं सहना चाहिए। समझौता करना ठीक है, लेकिन केवल वहीं तक जहाँ आत्मसम्मान और मानसिक शांति बनी रहे।
समस्या का सामना करना चाहिए। आत्महत्या करना और हत्या करना दोनों ही जघन्य अपराध और दुखद त्रासदियाँ हैं। किसी भी कठिन परिस्थिति में संवाद, कानूनी सहायता, परिवार, मित्रों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मदद लेना कहीं बेहतर विकल्प है। एक संवेदनशील समाज वही है जो लोगों को चुप रहने नहीं, बल्कि समय रहते बोलने, सुनने और सहारा देने की सीख दे।