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चंबल के क्रांतिवीरों को न्याय दिलाने उठी आवाज, 13-14 अप्रैल को इटावा में होगा ‘चंबल परिवार’ का जमावड़ा

  • April 10, 2026
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Jagrat Times, इटावा: चंबल संग्रहालय, पंचनद द्वारा आगामी 13 और 14 अप्रैल को इटावा में “चंबल परिवार” का जमावड़ा आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर चंबल

चंबल के क्रांतिवीरों को न्याय दिलाने उठी आवाज, 13-14 अप्रैल को इटावा में होगा ‘चंबल परिवार’ का जमावड़ा

Jagrat Times, इटावा: चंबल संग्रहालय, पंचनद द्वारा आगामी 13 और 14 अप्रैल को इटावा में “चंबल परिवार” का जमावड़ा आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर चंबल अंचल के क्रांतिवीरों को न्याय दिलाने, क्रांति नायकों की स्मृतियों को जीवंत एवं संरक्षित करने, तथा क्रांतियोद्धा जीता चमार, जंगली-मंगली भंगी और मारून सिंह लोधी के गौरवशाली स्मारक निर्माण की मांग को लेकर विविध कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की गई है। साथ ही चंबल घाटी की शौर्यगाथाओं को सम्मान देने के लिए भी अभियान चलाया जाएगा।

कार्यक्रम के तहत 13 अप्रैल 2026, सोमवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के नाम संबोधित ज्ञापन प्रातः 11 बजे जिलाधिकारी, इटावा को सौंपा जाएगा। वहीं 14 अप्रैल को भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में “क्रांतिकारी जीता चमार स्मरण सभा” का आयोजन प्रातः 10 बजे बुद्धा पार्क, नुमाइश ग्राउंड में किया जाएगा।

जंगली-मंगली भंगी : चंबल के शौर्य के दो अमर प्रतीक

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में चंबल के दो सपूत—जंगली और मंगली भंगी—ने इतिहास में ऐसा अध्याय जोड़ा, जो आज भी प्रेरणा देता है।
सामाजिक रूप से वंचित वर्ग से होने के बावजूद उनकी देशभक्ति और आत्मसम्मान ने उन्हें असाधारण ऊँचाई प्रदान की। चकरनगर को केंद्र बनाकर उन्होंने लगभग सौ मील के क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध अनेक युद्ध लड़े।

1 नवंबर 1857 को शेरगढ़ का युद्ध, 3 दिसंबर को इटावा पर कब्ज़े की लड़ाई, तथा जनवरी से अप्रैल 1858 के बीच भोगनीपुर, कानपुर देहात, कालपी और चरखारी के युद्धों में उन्होंने अद्वितीय साहस का परिचय दिया।
6 सितंबर 1858 को चकरनगर युद्ध और 11 सितंबर को सहसों के युद्ध में उन्होंने 22 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया और स्वयं वीरगति को प्राप्त हुए। इतिहास में ये दोनों भाई दलित शौर्य के अग्रदूत माने जाते हैं।

जीता चमार : पंचनद का अडिग योद्धा

भरेह रियासत के बंसरी गांव के निवासी जीता चमार 1857 की जनक्रांति के एक प्रमुख सशस्त्र नेता थे। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध न केवल संघर्ष छेड़ा, बल्कि कंपनी सरकार को गंभीर क्षति भी पहुंचाई।

अंग्रेजी सत्ता ने उन्हें आत्मसमर्पण के लिए इनाम और माफी का लालच दिया, लेकिन जीता चमार अपने संकल्प पर अडिग रहे। वे अंत तक औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करते रहे और उसके पतन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके साहस ने चंबल घाटी को क्रांति की ज्वाला से आलोकित किया।

चंबल परिवार के प्रमुख डॉ. शाह आलम राणा ने क्षेत्रवासियों से अपील करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि चंबल के इन गुमनाम नायकों को इतिहास में उनका उचित स्थान मिले। उनके नाम पर स्मारक बनाए जाएं, उनकी गाथाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए और नई पीढ़ी को बताया जाए कि स्वतंत्रता की नींव चंबल की घाटियों के बलिदान और साहस से सिंचित हुई है।

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