कोलकाता लिटरेरी मीट में लेखिका आरती पाठक ने प्रेम, रामायण और स्वस्थता को किया केंद्रित
March 19, 2026
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Jagrat Times, कोलकाता : लेखिका, वक्ता और कैंसर सर्वाइवर आरती पाठक ने अलीपुर म्यूज़ियम में आयोजित कोलकाता लिटरेरी मीट (कालाॅम) के 14वें संस्करण में श्रोताओं को संबोधित किया।
Jagrat Times, कोलकाता : लेखिका, वक्ता और कैंसर सर्वाइवर आरती पाठक ने अलीपुर म्यूज़ियम में आयोजित कोलकाता लिटरेरी मीट (कालाॅम) के 14वें संस्करण में श्रोताओं को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने प्रेम, रामायण के जीवन-दर्शन और शारीरिक तथा मानसिक स्वस्थता की बहुआयामी प्रक्रिया पर एक गहन और विचारोत्तेजक संवाद प्रस्तुत किया।
आरती पाठक ‘हर्ट लॉकर’ शीर्षक वाले पैनल का हिस्सा थीं, जिसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक जेरी पिंटो भी उपस्थित थे। इस चर्चा का संचालन कोलकाता की सामाजिक कार्यकर्ता एवं अंगदान अभियान से जुड़ीं श्रुति मोहता ने किया। संवाद का केंद्र बिंदु दया, सहानुभूति, उपशामक देखभाल (पैलियेटिव केयर) और मानवीय संवेदना रहा, जिसमें प्रेम, भारतीय ज्ञान परंपरा और समर्पण के सूत्र बार-बार उभरकर सामने आए।
आरती पाठक, जिन्हें अपनी माता के निधन के कुछ ही घंटों बाद अपने कैंसर का पता चला, ने अपने अनुभवों को अपनी पुस्तक “ट्रिपल नेगेटिव: ए टेल ऑफ लव, फेथ एंड सरेंडर” में अत्यंत निर्भीकता के साथ दर्ज किया है। यह पुस्तक उनके संघर्ष की उस यात्रा को सजीव करती है, जिसमें प्रेम, विश्वास और आंतरिक संतुलन ने उन्हें थामे रखा।
प्रेम की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि कठिन समय में स्वयं को दूसरों का स्नेह स्वीकार करने की अनुमति देना भी साहस का ही रूप है। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा, “हम मनुष्य हैं; हमें समुदाय में जीने के लिए बनाया गया है। मुझे यह सौभाग्य मिला कि मेरे जीवन में ऐसे लोग थे जो मुझसे प्रेम करते थे। मैंने अपने चारों ओर खड़ी दीवारें तोड़ीं। जब मेरे पति मेरे साथ खड़े होना चाहते थे, मैंने उन्हें आने दिया। जब सहेलियों ने संपर्क करने का प्रयास किया, मैंने फोन उठाया। उन्होंने जो सच्ची और सद्भावना से भरी राय दी, उसे मैंने स्वीकार किया।”
जब उनसे पूछा गया कि कठिन दौर से गुज़र रहे लोगों को वह क्या कहना चाहेंगी, तो उन्होंने विनम्रता से उत्तर दिया, “मैं किसी को सलाह देना पसंद नहीं करती, लेकिन यदि कोई पूछे तो मैं कहूँगी— यदि आपके जीवन में ऐसे लोग हैं जो आपकी देखभाल करना चाहते हैं, तो उन्हें आने दें। अपने ऊपर यह उपकार कीजिए। स्वयं को यह उपहार दीजिए।”
आरती पाठक का लेखन निजी अनुभवों को भारतीय सभ्यता की व्यापक दृष्टि से जोड़ने का प्रयास करता है। मानसिक दृढ़ता और आध्यात्मिक आधार की आवश्यकता पर उन्होंने स्पष्ट कहा, “यदि मन मजबूत न होता, तो मैं हार जाती। मैं स्वयं को सबसे कमजोर व्यक्ति समझती थी।”
उन्होंने बताया कि एक योग शिक्षक ने उन्हें प्राणायाम का मार्ग दिखाया, जिसने उनके भीतर एक गहरा परिवर्तन लाया। “मुझे लगा यह स्वयं ईश्वर तक पहुँचने का एक सुंदर मार्ग है,” उन्होंने कहा। उपचार के दिनों में वह सूर्योदय से पहले उठकर अपने पति के साथ प्राणायाम करती थीं।
“जब बंद आँखों पर सूर्य की किरणें पड़तीं और मैं ओम् का जप करती, तो मुझे लगता था कि मैं पूरे ब्रह्मांड से एक हो गई हूँ। मुझे अनुभव हुआ कि मेरे भीतर की आत्मा वही है जो हर जीव में है— और अंततः वह ईश्वर का अंश है। उसी अनुभूति ने मेरे भीतर के भय और नकारात्मक विचारों को शांत किया।” इसी साधना ने उनके भीतर अंतर-संतुलन और मानसिक स्वस्थता को दृढ़ किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आध्यात्मिक साधना चिकित्सा का विकल्प नहीं है, बल्कि मानसिक संतुलन और आंतरिक स्थिरता का एक सहायक आधार है— ऐसा आधार जो अनिश्चितता के समय मन को थामे रखता है।
रामायण भी उनके विचारों का एक केंद्रीय आधार रही। उन्होंने इसे किसी दूरस्थ मिथक के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के जीवंत स्रोत के रूप में देखा। “महाकाव्यों का मूल तत्व मेरी आत्मा तक पहुँचा,” उन्होंने कहा। उन्होंने आगे कहा, “यदि श्रीराम और देवी सीता— जो नवविवाहित, एक-दूसरे से गहरा प्रेम करने वाले और धर्म के मार्ग पर चलने वाले थे— यदि उन्हें भी इतना कष्ट सहना पड़ा, जबकि वे देवताओं के अवतार थे, यदि उन्हें भी पृथ्वी पर अपने कर्म भोगने पड़े, तो मैं कौन हूँ? मैं क्यों अपने कर्मों से बचूँ? मुझे भी अपने भाग्य का भोगना होगा।”
यह बोध, उनके अनुसार, उन्हें साहस देता रहा। उनके लिए रामायण इसलिए प्रेरणास्रोत बनी क्योंकि वह कष्ट से मुक्ति का आश्वासन नहीं देती, बल्कि कष्ट के बीच गरिमा और धैर्य का मार्ग दिखाती है। इस सत्र में श्रोताओं की सक्रिय सहभागिता ने संकेत दिया कि आज का पाठक साहित्य, जीवन-दर्शन और समकालीन अनुभवों के बीच पुल बनाने वाली चर्चाओं में गहरी रुचि रखता है। आरती पाठक ने अपने अनुभव, आध्यात्मिकता और रामायण से प्राप्त दृष्टि को इस प्रकार जोड़ा कि श्रोताओं के सामने दृढ़ता, स्वस्थता और आशा का एक बहुआयामी दृष्टिकोण उपस्थित हुआ।
कोलकाता लिटरेरी मीट जैसे मंच आज ऐसे संवादों के लिए महत्वपूर्ण स्थान बनते जा रहे हैं, जहाँ साहित्य और जीवन-दर्शन एक-दूसरे से संवाद करते हैं। आरती पाठक की यह प्रस्तुति इस बात का उदाहरण थी कि कहानियाँ केवल पीड़ा का वर्णन नहीं करतीं— वे पीड़ा के बीच स्वस्थता और प्रकाश का मार्ग भी दिखाती हैं।