जोगीरा सररररर………….
- March 2, 2026
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Jagrat Times/ मरजिया जाफर/ Noida काहे खातिर राजा रूसे काहे खातिर रानी। काहे खातिर बकुला रूसे कइलें ढबरी पानी॥ जोगीरा सररर…. राज खातिर राजा रूसे सेज खातिर रानी।
Jagrat Times/ मरजिया जाफर/ Noida
काहे खातिर राजा रूसे काहे खातिर रानी।
काहे खातिर बकुला रूसे कइलें ढबरी पानी॥ जोगीरा सररर….
राज खातिर राजा रूसे सेज खातिर रानी।
मछरी खातिर बकुला रूसे कइलें ढबरी पानी॥ जोगीरा सररर….
इन गानों की घुने जब कानों में गुलने लगें तो समझो होली आ गई। ये होली के पर्व पर गाए जाने वाले जोगीरा गीत हैं। जिसे मंडलियां गाती और अपनी घुन बजाती थीं। सदियों से गुनगुनाएं जा रहे होली के लोक गीत अपनी एक लंबी यात्रा तय करने के बाद थोड़े बदल भी गए हैं, गीत तो वही है लेकिन धुन में फर्क है। लेकिन गुजरे जमाने की बाात की जाए तो फाग होली में ही गाए जाते थे। होली के त्योहार की मस्ती, में सराबोर होकर होली के लोक गीत गुनगुनाते हुए मस्ती से भरे लोक गीतों की रंगीन यात्रा पर चलते हैं।
होली के लोक गीतों की रंगीन यात्रा
दरअसल, लोक गीत किसी व्यक्ति के लिखे नहीं होते बल्कि यह लोगों के दुख-सुख की अभिव्यक्ति होते हैं। मसलन एक लोक गीत कइयों की अभिव्यक्ति है।
यह एक सिलसिला है जो चलता आया है और लोक गीत समय के मुताबिक अपनी शक्ल अख्तियार करते गए हैं। इस तरह लोक गीत लंबे समय में अपना रंग रूप बदलते रहे हैं। लोक गीत किसी रचनाकार या किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं होते। अपनी भावनाओं की सामूहिकता में लोक गीत धीरे-धीरे एक रूप लेकर लोकप्रिय होते हैं।
प्रोफेसर डॉ. मनोज मिश्र कहते हैं, ‘जो लोग अपनी बात लोक गीत की तर्ज पर लिखता है, वो लोक गीत नहीं बल्कि एक गीत कहलाएगा। लोक गीत वो है जो लोगों द्वारा रचा गया है। जो अपने आप में इतिहास है, अगर हम इतिहास में जाएं तो मनुष्य ने अपना दर्द साझा करने के लिए लोक गीतों को अपना सबसे खूबसूरत मीडियम या जरिया बनाया। फिर यही लोक गीत लोगों की जुबान पर चढ़ गए।’
व्यक्ति अपनी बातों को कम या ज्यादा भाव के जरिए व्यक्त नहीं कर पाता, लेकिन गीत से अपनी बात को मुकम्मल शक्ल दे पाता है। जैसे शायरी प्रभावी होती है।
लेकिन अगर कोई बात विस्तार कहते हैं तो वह इतना असर नहीं डालती। तो जब भी कोई त्योहार आया, जब भी कोई दुख आया, कोई पीड़ा महसूस हुई उसे एक गीत का रूप में कह दिया गया। गीत में सभी भावनाएं, अनुभव, उल्लास और उत्सव सिमट जाते हैं।
लोक साहित्य वक्त के साथ धीरे-धीरे बनता है। जरूरी नहीं लोक गीत आज जिस रूप में प्रचलित हैं, सैकड़ों साल पहले वह उसी रूप में रहे होंगे। वह अपने अनुभवों और भावनाओं के माध्यम से बदलते भी रहते हैं। उनकी लय, सुर और ताल भी वक्त के साथ बदलती रहती है।
होली के गीतों की बात चली है तो चाहे पूर्वांचल हो, बिहार हो, राजस्थान या मध्य प्रदेश हो, उनमें एक खास बात देखने को मिलेगी और वो है राधा-कृष्ण का प्रेम।
उसमें नौजवान या युवा मन की चुहलबाजियां होती हैं। इन लोक गीतों में उम्र का जोश और खिलंदड़ापन इस हद तक दिखता है कि कभी कभी वो अश्लील भी हो जाता है।
अब सवाल है यह सब कहां से शुरू हुआ, तो देखेंगे कि ‘कोर्ट पोएट्री’ जिसे ‘दरबारी कविता’ कहते हैं, से शुरू हुई। यह संस्कृति हिंदी में बहुत बाद में आई, जबकि संस्कृत भाषा में बहुत पहले से मौजूद थी।
महाकवि जयदेव का लिखा ‘गीत गोविंद’ को श्रीकृष्ण की श्रृंगारिक कविताओं की पहली किताब माना गया।
श्रृंगारिक मतलब रोमांटिक जिसमें दैहिक संबंधों का भी जिक्र मिलता है। गीत गोविंद को ही आधार बनाकर लोगों ने अपनी कविताएं लिखनी शुरू कीं।
कह सकते हैं कि भारत में तभी से रोमांटिक कविताओं ने अपना रूप लिया। भारत के हिंदी भाषी इलाकों में जब कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा फैल रही थी, वह 16वीं शताब्दी का दौर था। तब सूरदास जैसे कवियों ने रोमांटिक कविताओं को विस्तार दिया।

लोक गीतों और पर्व में संबंध
प्रोफेसर डॉ. मोनज मिश्र कहते हैं कि भारत में दो बड़े त्योहार हैं, और दोनों फसलों से जुड़े त्योहार हैं। एक ठंड की फसल, एक गर्मी की फसल जिसे हम रवि और खरीफ की फसल कहते हैं।
चूंकि भारत किसानों का देश है। किसानों के लिए फसल मुद्रा का काम करती है। पैसा रहेगा त्योहार मनेगा, पैसा नहीं रहेगा त्योहार नहीं मनेगा। फसल होगी कपड़े आ जाएंगे। फसल होने के बाद ही खाने की थाली भी सजेगी।
हिंदी भाषी इलाकों में होलिका जलती है, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में संवत जलती है। यह वो समय होता है जब फसल तैयार होती है। इंसान इसे त्योहार के रूप मेें मनाकर प्रकृति का सम्मान करता है।
इसमें वंसत पंचमी के दिन एक हरे बांस या एरंड के पेड़ में अलसी-जौ का पौधा बांधकर का पान-सुपारी के साथ पूजन करके जमीन में गाड़ दिया जाता है। इसी दिन से फगुआ गीत गायन शुरु हो जाता है। यह क्रम संवत के अंतिम दिन पूर्णिमा को संवत जलाने तक चलता है। दूसरे दिन यह उत्सव अपने शिखर पर पहुंच जाता है।
प्रोफेसर डॉ. मोनज मिश्र के मुताबिक विद्वान कहते हैं कि होली-दिवाली जैसे त्योहार में मायथोलॉजी बहुत बाद में आकर जुड़ी। लेकिन ऋतु परिवर्तन सबसे बड़ा सच है। दिवाली तब मनाई जाती है जब मौसम बदलता है, उस समय हम ठंड की तरफ जा रहे होते हैं।
इसी तरह होली गर्मी के आने का सूचक है। यह ट्रांजिशन का समय होता है। इसी बीच में हम त्योहार मनाते हैं क्योंकि इसी समय किसान का घर धन धान्य से भरा होता है। व्यक्ति आतंरिक खुशी महसूस करता है।
दूसरी वजह श्रीकृष्ण भक्ति परंपरा रही है, श्रृंगारिक यानी रोमांस को बहुत पॉजिटिव नजरिए से देखा जाता रहा है, इस मामले में भारतीय संस्कृति समृद्ध रही है। तब रोमांस को लेकर नेगेटिविटी कहीं नहीं थी। इसी दौर में राधा और कृष्ण के गीत गाने की परंपरा चल पड़ी। राधा-कृष्ण के प्रेम गीतों के माध्यम से युवा प्रेम को मान्यता मिली।
प्रोफेसर डॉ. मोनज मिश्र कहते हैं प्रेम के लिए इससे अच्छा मौसम क्या होगा? बसंत का मौसम है, चारों तरफ फूल खिले हैं, फसल कटने के बाद किसानों को भी प्रेम व्यक्त करने का समय मिलता है।
होली का त्योहार यह एक लोक परंपरा है जहां युवा अपने प्रेम को व्यक्त करता है। चूंकि लोक गीत जनमानस की अभिव्यक्ति है। जनमानस भीड़ की तरह उमड़ता है। भीड़ में अगर चुहलबाजियां होती हैं तो गड़बड़ियां भी होती हैं। इसलिए कई जगह अश्लीलता भी मिलती है। इन लोक गीतों में अश्लीलता इसलिए आई क्योंकि धीरे धीरे बदलते समाज में हताशा और कुंठा भी समय के साथ बढ़ती गई।
मूलतः यह समूह गान है। प्रश्नोत्तर शैली में एक समूह सवाल पूछता है तो दूसरा उसका जवाब देता है जो हमेशा चौंका देने वाला होता है। प्रश्न और उत्तर शैली में निर्गुण को समझाने के लिए गूढ़ अर्थयुक्त उलटबांसियों का सहारा लेने वाले काव्य की प्रतिक्रिया में इन्हें रोजमर्रा की घटनाओं से जोड़कर बोलचाल की भाषा में रचा गया है।
प्रोफेसर डॉ. मोनज मिश्र कहते हैं कि जोगीरा सेक्शुअल फ्रस्ट्रेशन की भी अभिव्यक्ति है। एक तरह से उसमें काम-अंगों, काम-प्रतीकों की भरमार है। जोगीरा के बहाने गरियाने और अपना गुस्सा निकालने का यह अपना ही तरीका है जहां रिश्तों को लेकर लोग अपना फ्रस्ट्रेशन गा गाकर निकालते हैं।
वास्तव में, होली खुलकर और खिलखिलाकर कहने की परंपरा है। यही कारण है कि जोगीरे की तान में बुराइयों से भरे समाज पर तंज दिखता है। होली की मस्ती के साथ वह आसपास के समाज पर चोट करता हुआ नज़र आता है।
सुहाना मौसम और फाग गीत
दक्षिण में यह नहीं है क्योंकि उत्तर और दक्षिण का मौसम अलग अलग है। भारत के ऊपरी भूभाग में देखेंगे हर इलाके की अपनी होली है, कूल्लू की होली, कश्मीर की होली, सिंध की होली, असम की होली, बिहार और पूर्वांचल, बृज की होली, मध्य प्रदेश और राजस्थान की होली। यही नहीं पाकिस्तान के इलाकों में भी होली मनाई जाती है। लेकिन सबका ट्रेंड एक ही है। सबमें होलिका जलाई जा रही है क्योंकि यहां के किसानों के पास जलाने के लिए फसलों के अवशेष थे।
फागुन के मौसम में हल्की ठंड है तो वो आग अच्छी भी लग रही है। इस आग में खेत में लगी फसल को भूनकर खाना भी होता है। मतलब यह प्रेम को अभिव्यक्ति का समय होता है। कहीं सलील तो कहीं अश्लील दोनों गाए जाते हैं और बिल्कुल खुले मन से गाए जाते हैं।
प्रोफेसर डॉ. मोनज मिश्र कहते हैं कि इस गायन में भी एक खास बात है, स्त्री की अभिव्यक्ति अलग और पुरुष की अभिव्यक्ति अलग है। पुरुषों के गीत ज्यादा आक्रामक मिलेंगे, पुरुष के गीत में जेंडर सेंसटिविटी न के बराबर मिलेगी।
वहीं स्त्रियों के गीत विरह से भरे होंगे। स्त्री के गीत प्रेमी या पार्टनर के इंतजार को अभिव्यक्त करते हैं। स्त्री के गीत में इंतजार है, मिलन की अकांक्षा है। उसमें सेंसटिविटी ज्यादा है। स्त्री को उम्मीद है कि उसका प्रियतम अब जा जाएगा क्योंकि पहले भी लोग घर से बाहर जाते थे। ये सामूहिकता है।
औरतों की सामूहिकता है, पुरुषों की सामूहिकता है। ये गीत समाज की परिस्थितियों से निकले हैं। जहां जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस की गई उसे गीत में ढाल दिया गया। सलील और अश्लील दोनों गीत अहम हैं क्योंकि उनमें समाज की अभिव्यक्ति दिखती है।
होली के गीतों का रिवाज 8वीं सदी में हिंदी बेल्ट में मजबूत हुआ होगा। बौद्धों की परंपरा में सिद्ध और योगी हुए वहां से जोगिरा गाने की परंपरा निकली। सिद्धों ने निरगुण को बहुत बढ़ावा दिया। जोगिरा, योगी शब्द से बना है। जोगिरा में जो प्रेमिका है वह ईश्वर है, जो प्रेमी है वह मनुष्य है जो ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है।
आप सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं।