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शिक्षक और छात्रों को अमर्यादित शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए : डाॅ.दीपिका

  • December 22, 2025
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-बच्चे अपने शिक्षक को ‘देखकर सीखते हैं, कैसे बात करनी चाहिए, कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए -अगर शिक्षक असभ्य या अमर्यादित शब्दों क प्रयोग करें, तो उसक नकारात्मक प्रभाव

शिक्षक और छात्रों को अमर्यादित शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए : डाॅ.दीपिका

-बच्चे अपने शिक्षक को ‘देखकर सीखते हैं, कैसे बात करनी चाहिए, कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए

-अगर शिक्षक असभ्य या अमर्यादित शब्दों क प्रयोग करें, तो उसक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है

-छात्रों के कॅरियर, जीवन और भविष्य को संवारने के लिए शिक्षक डांटते या फिर पिटाई करते हैं

-हमेशा ध्यान रखें, कभी भी जातिसूचक शब्दों का भी एक-दूसरे के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए

Jagrat Times, कानपुर : माता-पिता के बाद गुरु ही जो हमारे जीवन, कॅरियर और भविष्य को संवारने का काम करते हैं। कुम्हार मिट्टी के बर्तन को सही आकार देकर चोट करता है। एक सुनार सोने को आकार देने के लिए उसे और तपाता है ताकि उसकी आकृति आकर्षक हो सके। उसी प्रकार अध्यापक, गुरु, टीचर या फिर कहें प्रोफेसर भी अपने छात्रों को निखारने के लिए उनको डांटता है और कभी-कभी थोड़ी पिटाई भी कर देते हैं। पर उसका उद्देश्य उस छात्र की निंदा या अपमान करना नहीं बल्कि उसे सही रास्ते पर लाना होता है। लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि कभी भी टीचर या छात्र को गुस्से में आकर आपत्तिजनक, गलत या गंदे शब्दों का व्यवहार नहीं करना चाहिए। जातिसूचक शब्दों का भी एक-दूसरे के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए। अध्यापक के साथ ही छात्रों को भी एक-दूसरे के स्वाभिमान और मान-सम्मान का पूरा ध्यान रखना चाहिए। कभी ऐसे व्यवहार या शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए खुद के साथ ही दूसरे को भी लल्जित और अपमानित होना पड़े।
इस गंभीर विषय पर कानपुर में महाराणा प्रताप डेंटल कालेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपिका शुक्ला ने बताया कि शिक्षक बच्चों के जीवन एक दर्पण की तरह होते हैं। जब वे सकारात्मक भाषा और आदरपूर्ण व्यवहार दिखाते हैं, तो बच्चे वही सीखते हैं और आत्मविश्वास के साथ आगे बढते हैं। वहीं, अगर शिक्षक असभ्य या अमर्यादित शब्दों क प्रयोग करें, तो उसक नकारात्मक प्रभाव तुरंत पड़ता है। बच्चे अपने शिक्षक को देखकर ही सीखते हैं कि कैसे बात करनी चाहिए, कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए। अगर शिक्षक शांति से बात करते हैं, तो बच्चे भी वही अपनाते हैं। छात्रों और शिक्षकों दोनों को कक्षा और आपसी बातचीत में गलत या गंदे शब्दों का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह भाषा चरित्र को खराब करती है, सीखने के माहौल को नुकसान पहुंचाती है, दूसरों को ठेस पहुंचाती है, और नकारात्मकता फैलाती है।शिक्षकों को सकारात्मक रोल मॉडल बनना चाहिए और छात्रों को सम्मानजनक भाषा सिखाने के लिए खुले संवाद और मार्गदर्शन का उपयोग करना चाहिए, जिससे एक स्वस्थ और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण बन सके।

डॉ. दीपिका शुक्ला ने बताया कि शिक्षक छात्रों के लिए प्रेरणा होते हैं; गलत भाषा का प्रयोग करके वे बच्चों को भी वैसा ही करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जो गलत है। अपशब्दों से छात्रों का विश्वास टूटता है और नकारात्मकता फैलती है, जिससे एक सकारात्मक छात्र-शिक्षक संबंध नहीं बन पाता। गाली-गलौज से ध्यान भटकता है और सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है। यह आदत चरित्र और स्वभाव को बिगाड़ती है और व्यक्तित्व को कमजोर करती है। अपनी ज़रूरतों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सही शब्दों का प्रयोग करें। “मूर्ख”, “आलसी”, “नाकारा” और “गधे” जैसे शब्द छात्रों के आत्मविश्वास को तोड़ते हैं और उन्हें गलत लेबल देते हैं, इनसे बचना चाहिए।

एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपिका शुक्ला ने महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि शिक्षक और छात्रों के बीच भाषा के प्रयोग पर खुलकर बात करें और समझाएं कि शब्दों का क्या प्रभाव पड़ता है। स्कूल और कक्षा के लिए भाषा के उपयोग के स्पष्ट नियम हों और उनका पालन कराया जाए। ऐसी कक्षा बनाएं जहां छात्र सवाल पूछने या गलती करने से डरें नहीं, बल्कि उन्हें सीखने का अवसर मिले। शिक्षक और छात्र दोनों को शब्दों का उपयोग जिम्मेदारी से करना चाहिए ताकि शिक्षा का माहौल सकारात्मक और सम्मानजनक बना रहे।

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