अनुपमा ‘अनुश्री’ द्वारा रचित हृदय गंगे…पुनः अध्यात्म की ओर का संदेश देती
December 6, 2025
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अपने लेखन से अनुपमा श्रीवास्तव ‘अनुश्री’ ने किताबों की दुनिया में विशेष पहचान बनाई है तन प्रदूषित ,मन प्रदूषित ,सृष्टि का कण-कण प्रदूषित।शेष जीवन में रहा क्या,हे प्रभो,
अपने लेखन से अनुपमा श्रीवास्तव ‘अनुश्री’ ने किताबों की दुनिया में विशेष पहचान बनाई है
तन प्रदूषित ,मन प्रदूषित ,सृष्टि का कण-कण प्रदूषित। शेष जीवन में रहा क्या, हे प्रभो, जो करूँ अर्पित।।
Jagrat Times, Kanpur/ हमारा जीवन भी द्वंदात्मक है। मनुष्य अनादि काल से अंधकार में प्रकाश खोज रहा है ,लेकिन चेतना की खिड़की नहीं खोल रहा है। केवल स्वाभाविक जीवन जी रहा है। समाधान की खोज एकांगी होती है। समस्या का समाधान बाहर नहीं ,भीतर है। यह समाधान की विपरीत दिशा है। इस दिशा में वही चलता है जिसका अंतःकरण पवित्र हो।
अनुपमा श्रीवास्तव अनुश्री के सद्य प्रकाशित काव्य संकलन को पढ़कर मुझे ऐसा ही लगा कि विचार के परमाणु पुंज समूचे आकाश में फैले हुए हैं यह जब किसी रचनाकार के मस्तिष्क में प्रविष्टि करते हैं ,तो एक नए विचार को जन्म देते हैं। ये विचार मौलिक है या नहीं या जिन्हें हम मौलिक मानते हैं वह सचमुच में मौलिक हैं! हम नहीं कह सकते । इसकी गहराई में हमें नहीं जाना है। किंतु ज्ञात जगत में अज्ञात के प्रति बिंब सदा नया होता है। उसकी स्वीकृति मिलना चाहिए। यही सोच कर मैं इस पुस्तक पर अपने विचार प्रकट कर रहा हूंँ।
अनुश्री ने अपनी बात में कुछ नहीं कहा है। सब कुछ पाठकों के हाथों में समर्पित कर दिया है। यह भी इस कृति का मूल हेतु है। अपने विचार पाठक पर थोपने की अपेक्षा वे पाठक को रचना से संवाद स्थापित करने का आग्रह करती हैं। भाव की निष्पत्ति संवाद से होती है और संवाद की निष्पत्ति भाव से। यह क्रम चलना भी चाहिए। पाठक किसी रचना को पढ़े और भाव का विकास न हो तो रचना बेकार है क्योंकि अक्षरों का ग्रहण तो मोबाइल भी कर लेता है ,लेकिन उससे हमारी चेतना का जागरण नहीं होता। चेतना की जागृति ही बड़ी उपलब्धि है, जिसके द्वारा जीवन की क्रिया संचालित होनी चाहिए। ‘हृदय गंगे’ शीर्षक से रची पंक्तियों में यह भाव प्रकट करते हुए अनुश्री कहती हैं- “गंगा आचमन से पूर्व, हृदय गंगे की पवित्रता सुनिश्चित करें!
मीरा और महादेवी की रचनाओं सी विरह अनुभूति इन रचनाओं में आभासित होती है। कुछ पंक्तियांँ देखिए- ” क्या समीर से सीखा हमने सुरभित करना ,सांँस देना! क्या सरिता से सीखा हमने, सागर की ओर अविरल बहना!” भारतीय चिंतन की यही विशेषता है कि वह समष्टि में ही अपने व्यक्तित्व को विसर्जित करने की कला सिखाता है।
‘ द्वेताद्वेत ‘कविता में नया बिंब विधान भी देखने को मिलता है- “कभी ज़िंदगी की कढ़ाई में खारा दुख पकता है। कभी सुख की कलछी मिश्री घोलती है।।”
कवयित्री को चिंता है तो केवल आदमकद की , वे कहती हैं- ” रे आदमकद! तू हो गया है कितना बौना! तुझे हर वक्त चाहिए सुख- सुविधाओं का बिछौना ।” इस चिंता का समाधान भी वे इस कविता में प्रस्तुत करती हैं। “किसी से क्या सत्य पूछना है! किसी से क्या सत्य सुनना है! जब स्वयं के भीतर बहता अध्यात्म का पावन झरना है, जो अनिवार्य ,अमोघ ,अप्रतिम, शाश्वत अभ्यर्थना है।”
यह शाश्वत अभ्यर्थना अब सुनाई नहीं देती क्योंकि- धर्म दीवारों पर संँवर गया मंदिर में बस गया चढ़ावे में चढ़ गया। तर्क ,वितर्क , कुतर्क, पुस्तकों का पात्र बन गया अपरिपक्वों का उपहास बन गया बनावटी चादर ओढ़कर तन गया दिखावे और चमक- दमक में रम गया।।” (प्रपंच का मारा) मन हुआ वृंदावन, भाव मल्लिका, सुख का सागर , कान्हा तुम्हें समझ पाना , वही अक्षय ऊर्जा , भारत, सीप का मोती , इसी तरह लगभग 78 कविताएंँ इस संकलन में है जो कहती हैं कि बौने और सोए हुए को भगवान भी नहीं जगा सकता। कविता का यही बीज मंत्र है। देश काल बदल रहा है ,हमारी सोच भी बदलना चाहिए। रचनाकार और पाठकों की सोच भी बदलना चाहिए और यह तभी संभव है जब “हृदय में गंगा ” हो। बाहरी गंगा प्रदूषित होती है तो उसे प्रदूषण मुक्त करने के लिए विशाल धन चाहिए। पर हृदय की गंगा प्रदूषित हुई, तो उसे स्वच्छ करने के लिए उत्तम साहित्य चाहिए, जो हृदय को छू सके। ऐसा प्रयास अनुपमा अनुश्री ने किया है। उनकी रचना प्रक्रिया से सशक्त होकर और भी रचनाएंँ इस ओर मुड़ें, यही सदिच्छा है।