कथा व्यास शैलेन्द्रदास जी महाराज से जानिए, कैसे करें घर पर तर्पण जिससे पूर्वज हो प्रसन्न
September 8, 2025
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घर मे तर्पण करने की विधि Pt Salendra Das Ji Maharaj Jagrat Times, Kanpur/ प्रातःकाल पूर्व दिशा की और मुँह कर बायें और दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली
घर मे तर्पण करने की विधि
Pt Salendra Das Ji Maharaj
Jagrat Times, Kanpur/ प्रातःकाल पूर्व दिशा की और मुँह कर बायें और दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली में पवित्री (पैंती) धारण करें। यज्ञोपवीत को सव्य कर लें। तीन कुशाओं को बाँधकर ग्रन्थी लगाकर कुशाओं का अग्रभाग पूर्व में रखते हुए दाहिने हाथ में जौ, जल, और अक्षत लेकर संकल्प पढ़ें।
तदनन्तर एक तांबे अथवा चांदी के पात्र में सफेद चन्दन, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसीदल रखें, फिर उस पात्र के ऊपर एक हाथ या प्रादेश मात्र लम्बे तीन कुश रखें जिनका अग्रभाग पूर्व की ओर रहे। इसके बाद उस पात्र में तर्पण के लिए जल भर दें। फिर उसमें रखे हुए तीनों कुशों को तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से ढक लें और निम्नाङि्कत मंत्र पढ़ते हुए देवताओं का आवाहन करें।
ऊँ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम हवम्। एदं बर्हिनिषीदत॥ (शु. यजु. 7।34) विश्वेदेवाः शृणुतेम हवं मे ये ऽअन्तरिक्षे य उप द्यवि ष्ठ। येऽअग्निजिह्नाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्वर्हिषि मादयद्ध्वम्॥ (शु. यजु. 33।53)
आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः।
ये तर्पणेऽत्रा विहिताः सावधाना भवन्तु ते॥
इस प्रकार आवाहन कर कुश का आसन दें और उन पूर्वाग्र कुशों द्वारा दायें हाथ की समस्त अङ्गुलियों के अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थ से ब्रह्मादि देवताओं के लिए पूर्वोक्त पात्र में से एक-एक अञ्जलि चावल मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्र में गिरावें और निम्नाङि्कत रूप से उन-उन देवताओं के नाम मन्त्र पढ़ते रहें –
इसके बाद जनेऊ को माला की भांति गले में धारण करके उत्तराभिमुख हो निम्नाङि्कत मन्त्र वचनों को दो-दो बार पढ़ते हुए दिव्य मनुष्यों के लिए दो-दो अञ्जलि यवसहित जल प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिका के मूल-भाग) से अर्पण करें।
(जनेऊ को दायें कंधे पर रखकर) पूर्वोक्त पात्रस्थ जल में काला तिल मिलाकर पितृतीर्थ से (अंगूठा और तर्जनी के मध्य भाग से) दिव्य पितरों के लिए निम्नाङि्कत मन्त्र-वाक्यों को पढ़ते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें ।
यमतर्पण- इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्र-वाक्यों को पढ़ते हुए चौदह यमों के लिये भी पितृतीर्थ से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें । ऊँ यमाय नम :॥3॥ऊँ धर्मराजाय नम :॥3॥ ऊँ मृत्युवे नमः॥3॥ ऊँ अन्तकाय नम :॥3॥ ऊँ वैवस्वताय नम :॥3॥ ऊँ कालाय नमः॥3॥ ऊँ सर्वभूतक्षयाय नम :॥3॥ ऊँ औदुम्बराय नम :॥3॥ ऊँ दध्नाय नमः॥3॥ ऊँ नीलाय नम :॥3॥ ऊँ परमेष्ठिने नम :॥3॥ ऊँ वृकोदराय नम :॥3॥ ऊँ चित्रााय नम :॥3॥ ऊँ चित्रागुप्ताय नम :॥3॥ दक्षिण की ओर बैठकर आचमन कर बायाँ घुटना मोड़ जनेऊ तथा उत्तरीय को दाहिने कंधे पर कर पितृतीर्थ तर्जनी के मूल तथा कुशा के अग्र भाग और मूल से तिल सहित प्रत्येक नाम से दक्षिण में तीन-तीन अंजलि देवें। पवित्री दाहिने तथा तीन को बायें हाथ की अनामिका में धारण करें।
मनुष्य पितृ तर्पण
तदन्तर अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिए पूर्वोक्त विधि से तीन-तीन अञ्जलि तिलसहित जल दे। यथा- अमुकगोत्राः अस्मत्पिता (बाप) अमुकशर्मा वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गा जलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्राः अस्मत्पितामहः (दादा) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्राः अस्मत्प्रपितामहः (परदादा) अमुकशर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मन्माता अमुकी देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं तलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मत्प्रपितामही (परदादी) अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥
द्वितीय गोत्रतर्पण- इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण करे, यहाँ भी पहले की ही भांति निम्नलिखित वाक्यों को तीन-तीन बार पढ़कर तिलसहित जल की तीन-तीन अञ्जलियाँ पितृतीर्थ से दे। यथा – अमुकगोत्राः अस्मन्मातामहः (नाना) अमुकशर्मा वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्राः अस्मत्प्रमातामहः (परनाना) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्राः अस्मद्वृद्धप्रमातामहः (बूढ़े परनाना) अमुकशर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मन्मातामही (नानी) अमुकी देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मत्प्रमातामही (परनानी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मद्वृद्धप्रमातामही (बूढ़ी परनानी) अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढ़ते हुए जल गिरावे । देवासुरास्तथा यज्ञा नागा गन्धर्वराक्षसाः । पिशाचा गुह्मकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः ॥ जलेचरा भूनिलया वाय्वाधाराश्च जन्तवः । प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिलाः ॥ नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः । तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया ॥ येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः । ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङि्क्षणः ॥ ऊँ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः । तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥ अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् । आब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥ येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः । ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा
भीष्म तर्पण इसके बाद दक्षिणाभिमुख हो पितृतर्पण के समान ही जनेऊ अपसव्य करके हाथ में कुश धारण किये हुए ही बालब्रह्मचारी भक्तप्रवर भीष्म के लिए पितृतीर्थ से तिलमिश्रित जल के द्वारा तर्पण करें। उनके तर्पण का मन्त्र निम्नाङि्कत है – वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतिप्रवराय च। गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम्।
निम्नलिखित वाक्य पढ़कर यह तर्पण-कर्म भगवान् को समर्पित करें- अनेन यथाशक्तिकृतेन देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणाखयेन कर्मणा भगवान् मम समस्तपितृस्वरूपी जनार्दनवासुदेवः प्रीयतां न मम। 🙏🚩ऊं नमो भगवते वासुदेवाय 🙏🚩