धर्म, साधना और आस्था का संगम श्रावण मास- पंडित चन्द्रकान्त शुक्ला
- July 15, 2025
- 0
Jagrat Times, Kanpur/ श्रावण मास, हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष का सबसे पावन मास माना जाता है। यह मास पूर्णतः भगवान शिव को समर्पित है। धर्म, साधना और
Jagrat Times, Kanpur/ श्रावण मास, हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष का सबसे पावन मास माना जाता है। यह मास पूर्णतः भगवान शिव को समर्पित है। धर्म, साधना और
Jagrat Times, Kanpur/ श्रावण मास, हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष का सबसे पावन मास माना जाता है। यह मास पूर्णतः भगवान शिव को समर्पित है। धर्म, साधना और आस्था का जो संगम इस मास में होता है, वह आत्मशुद्धि से लेकर सामाजिक संतुलन तक की गहराईयों को छूता है।
🔱 श्रावण का आध्यात्मिक महत्त्व
मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष निकला था, तब भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया और उन्हें “नीलकंठ” की उपाधि मिली। इसी कारण इस मास में शिवलिंग पर जल और गंगाजल चढ़ाकर शिव का अभिषेक करना अमोघ फलदायक माना गया है।
श्रावण सोमवार व्रत, बेलपत्र, पंचामृत अभिषेक और शिव मंत्रों का जाप — ये सभी क्रियाएं आत्मिक शांति और भक्त की कामनाओं की पूर्ति में सहायक होती हैं।
🧠 शिव भक्ति का वैज्ञानिक पक्ष
वेदों और योगशास्त्र में शिव को “आदियोगी” कहा गया है — प्रथम गुरु जिन्होंने ध्यान, साधना और ऊर्जा जागरण की विधियों का उद्घाटन किया।
श्रावण मास वर्षा ऋतु के मध्य होता है, जब वातावरण में आद्रता बढ़ जाती है, रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में व्रत, सात्विक भोजन और ध्यान व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक संतुलन प्रदान करते हैं।
“ॐ नमः शिवाय” और महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण मस्तिष्क की अल्फा वेव्स को सक्रिय करता है, जिससे तनाव और चिंता दूर होती है।
🌿 शिव पूजा में पर्यावरणीय संतुलन
शिव को अर्पित की जाने वाली सामग्रियां — जैसे बेलपत्र, धतूरा, गंगाजल — ये सभी प्राकृतिक और स्थानीय वनस्पतियां हैं। इनका प्रयोग न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि यह परंपरा स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण की दृष्टि से भी अद्वितीय है।
🙏 आज की आवश्यकता: आस्था को आत्मसात करें
आज जब समाज भागदौड़, अशांति और तनाव से घिरा हुआ है, श्रावण मास आत्मनिरीक्षण, संयम और साधना का अवसर देता है। यह समय है जब व्यक्ति अपने भीतर झांककर स्वयं को पहचान सकता है।
शिव केवल एक देवता नहीं, एक चेतना हैं।
उनकी पूजा केवल परंपरा नहीं, एक साधना है — जो हमें नीलकंठ बनना सिखाती है: विष को पीकर भी शांत और करुणामयी बने

विख्यात वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य पंडित चन्द्रकान्त शुक्ला