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विश्लेषणात्मक, शोध और लेखन कौशल, एक वकील की असली पहचान होती है : एडवोकेट प्रियंका बोराना

  • June 26, 2025
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-उचित रणनीति सुझाने व कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करते हैं वकील -कानूनी प्रक्रियाओं के साथ ही न्याय के नैतिक मापदंडों की भी रक्षा करते हैं

विश्लेषणात्मक, शोध और लेखन कौशल, एक वकील की असली पहचान होती है : एडवोकेट प्रियंका बोराना

-उचित रणनीति सुझाने व कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करते हैं वकील

-कानूनी प्रक्रियाओं के साथ ही न्याय के नैतिक मापदंडों की भी रक्षा करते हैं वकील

Jagrat Times, जोधपुर : वकील न केवल कानून की प्रक्रिया को समझते हैं, बल्कि वे समाज में न्याय और समानता सुनिश्चित करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी निभाते हैं। जोधपुर उच्च न्यायालय की अधिवक्ता प्रियंका बोराना का मानना है कि एक सफल वकील की पहचान केवल अदालत में दी गई दलीलों से नहीं होती, बल्कि उसके तार्किक सोच, गहन विश्लेषण, कानूनी शोध और प्रभावी लेखन क्षमता से होती है।

विशेष बातचीत में एडवोकेट प्रियंका बोराना ने कहा कि वकील मुवक्किलों के लिए केवल प्रतिनिधि नहीं होते, वे उनकी आवाज़ बनते हैं। उनके अधिकारों और हितों की रक्षा करते हैं, उन्हें उचित कानूनी रणनीति सुझाते हैं, और कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करते हैं। न्यायिक प्रक्रिया के प्रत्येक चरण- याचिका, दस्तावेजों की फाइलिंग, सुनवाई, अपील, में वकील की भूमिका अहम होती है। प्रियंका कहती हैं कि वकील कानूनी प्रक्रियाओं के साथ ही न्याय के नैतिक मापदंडों की भी रक्षा करते हैं। वे समाज में कमजोर और वंचित वर्गों के लिए भी न्याय की लड़ाई लड़ते हैं। यही भूमिका उन्हें एक सामाजिक परिवर्तनकर्ता भी बनाती है।

महिला अधिवक्ताओं के लिए नेटवर्किंग की चुनौतियाँ

हिंदुस्तान एक्सप्रेस में प्रकाशित प्रियंका बोराना के विशेष लेख “महिला अधिवक्ताओं के लिए नेटवर्किंग की चुनौतियाँ: बॉयज़ क्लब मानसिकता से पार पाने की राह” में उन्होंने इस बात को उजागर किया कि कैसे महिला वकीलों को नेटवर्किंग के मंचों से बाहर रखा जाता है। लेख में उन्होंने बड़ी ही साफगोई से बताया कि जब पुरुष वकील देर रात किसी नेटवर्किंग इवेंट या पार्टी में जाते हैं, तो उन्हें पेशेवर माना जाता है, जबकि महिलाओं पर सवाल उठाए जाते हैं। इसी मानसिकता को बॉयज़ क्लब कहा जाता है और इससे पार पाना, महिलाओं के लिए एक बड़ी लेकिन जरूरी चुनौती है।

प्रकाशित लेख का एक अंश

“जब एक महिला किसी इवेंट में देर रात तक रुकती है, तो उस पर व्यक्तिगत टिप्पणियाँ की जाती हैं, जबकि वही बात अगर पुरुष के साथ हो, तो वह उसकी मेहनत मानी जाती है।” प्रियंका बोराना मानती हैं कि समाज में न्याय को वास्तविक रूप तभी मिलेगा जब हम वकीलों की भूमिका को सिर्फ केस जीतने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें सामाजिक न्याय के वाहक के रूप में भी देखें।

सबसे अहम बात

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 वकीलों को भारत के किसी भी न्यायाधिकरण या अधिकृत निकाय के समक्ष पेश होने का अधिकार देती है। चाहे जब्ती की कार्यवाही हो या अपील, अधिवक्ता हर स्तर पर न्याय सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

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