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कैंसर विजेता आरती पाठक की योग-कथा : दुःख से ध्यान तक

  • June 20, 2025
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“डॉकटरों ने मेरा जीवन बचाया। और योग ने मुझे सिखाया कैसे उस जीवन को संतुलन, संपूर्णता  और निर्भय होकर जिया जाए” योगवाशिष्ठ मे लिखा है, “मनः प्रशमनोपायो योग

कैंसर विजेता आरती पाठक की योग-कथा : दुःख से ध्यान तक

“डॉकटरों ने मेरा जीवन बचाया। और योग ने मुझे सिखाया कैसे उस जीवन को संतुलन, संपूर्णता  और निर्भय होकर जिया जाए”

योगवाशिष्ठ मे लिखा है, “मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते” या, “योग का अर्थ है मन की शांति”

Jagrat Times, Kanpur/ शनिवार 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस है। इस महत्वपूर्ण दिन को आम जनता के स्वास्थ्य के लिए समर्पित करते हुए भारत ही नहीं पूरे विश्व में योग के बड़े बड़े आयोजन कर इसके फायदों को बढ़ चढ़कर हाईलाइट किया जाता है। इस महत्वपूर्ण विषय और आयोजन पर अपने अनुभव साझा करते हुए धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश की चर्चित लेखिका आरती पाठक ने बताया कि इस अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर, मैं केवल एक पर्व नहीं मना रही हूँ। मैं एक जीवन-रेखा को नमन कर रही हूँ। 2021 में अपनी माँ को कोविड को खो देने के बाद मुझे पता चला की मुझे ट्रिपल-नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर है। शारीरिक और मानसिक पीड़ा के चक्रवात ने मुझे जकड़ लिया।
कैंसर के लिए चिकितसिक उपचार आरंभ हो रहा था अपितु मेरे अशांत मन के लिए भी उपचार चाहिए था। देवताओं की मुझपर कृपा रही और योग के परिवार से मुझे आश्रय मिले। यह योग वैसा नहीं था जो सोशल मीडिया पर आकर्षक मुद्राओं में दिखता है। यह एक गहराई से निकला शब्दहीन संवाद था — मेरे शरीर, मन और आत्मा के बीच। मैंने प्राणायाम का अभ्यास आरंभ किया। योगवाशिष्ठ मे लिखा है, “मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते” या, “योग का अर्थ है मन की शांति”। यह सत्य है। यही मेरा अनुभव भी रहा।

प्रतिदिन सूर्योदय के समय धीरे-धीरे श्वास का अनुभव लेते हुए मैंने अप्रतिम शांति पाई। उस समय अपनी माँ के व्योग और कैंसर के इलाज के कारण जीवन नरक समान था, परंतु प्राणायाम के उन पलों मे मुझे केवल स्वर्ग जैसा और ईश्वर से निकटता का अनुभव होता था। और कदाचित ईश्वर ही मेरा मार्ग दर्शाते रहें क्यूंकी मुझे पता ही नहीं चला कब अष्टांग योग—(योग के आठ अंग)—मेरे जीवन में धीरे-धीरे समाहित होते गए।शब्दों से नहीं, अनुभव से। अष्टांग योग के आठ अंग होते है। यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। इनका गहम अर्थ कदाचित मुझे पता नहीं। पर फिर भी जो मेरा अनुभव रहा वह मैं लिखती हु।

योग के महत्वपूर्ण तथ्य

1 यम (नैतिक अनुशासन)
अहिंसा: मैंने अपने टूटते शरीर से द्वेष न करते हुए उसे प्रेमपूर्वक अपनाते देखा।
सत्य: अपनी पीड़ा, भय, भ्रम—सब कुछ सच्चाई से स्वीकारा, यह आवश्यक है क्यूंकी स्वयं से झूठ बोलना अत्यंत कष्टदायक होता है।
अपरिग्रह: शरीर की आकृति, अपने बालों या स्तन—इनसे मोह त्याग कर देखा कि मेरा अस्तित्व इससे आगे है।
2 नियम (स्व-अनुशासन)
शौच: मानसिक और शारीरिक सेहत और शुद्धता के लिए मैंने आयुर्वेद और योग अपनाया।
संतोष: परिस्थिति कितनी भी विपरीत रही, ईश्वर की कृपा ऐसी रही की उसमे भी मुझे जीवन की सुंदर्ता दिखी।
3 आसन: मेरी योगगुरु ने मुझे अपने शरीर के अनुरूप नियमित आसनों का अभ्यास कराया—जिससे मेरे स्नायुतंत्र को स्थिरता और हृदय को साहस मिलता रहा।
4 प्राणायाम
जैसे मैंने उपर लिखा था, गहरे श्वास-प्रश्वास के अभ्यासों ने मुझे अंधकार में भी दिव्यता की अनुभूति कराई। जब मन को अशांत रहने के अनेकों कारण थे, मैंने स्वयं को आनंदमय पाया।
ओंकार की नाद से सृष्टि का संचालन हुआ है, और ॐ प्राणायाम करने से मेरे चारों ओर मानो रक्षा कवच सा  बन गया, जिसने मेरे मन को टूटने न दिया।
5 प्रत्याहार (इंद्रियों का संयम)
बाहरी खबरों, सोशल मीडिया, लोगों की राय — सबका शोर छोड़कर मैं अपने भीतर की आवाज़ से जुड़ीं, और शांति को भीतर खोजा, बाहर नहीं।
6 धारणा (एकाग्रता)

कठिन समय मे हमें स्वयं को एक सूत्र में बाँधे रखना चाहिए, चाहे वह सूत्र हमारी संकल्प शक्ति हो, भक्ति हों या हमारे जीवन मे परिवार का प्रेम का आभास। प्राणायाम और ॐ जाप के कारण मेरा मन अनेक मोड़ों पर विचलित होने से बचता रहा।
7 ध्यान (मेडिटेशन)
एक ध्यान वह है जो लोग बैठ कर माल के साथ करते है। मेरा शरीर उस समय बैठ कर ध्यान करने योग्य न था। पर मुझे भी ध्यान मिला था- अपने समर्पण मे; देवी माँ के चरणों मे, ॐ के जाप मे, हनुमान चालीसा के चमत्कारों मे, अपने परिवार के स्नेह मे।
8 समाधि (परम एकत्व)
योगिक-समाधि की परिभाषा मुझे पता नहीं। पर मृत्यु के इतने निकट रहकर मैंने समझा कि वह एक दिन हम सब के लिए आएगी, पर हमें मृत्यु की परछाई में नहीं जीना है। क्या यह योग का सर्वोच्च रहस्य नहीं, अपनी नश्वरता में अमरता का बोध होना?
डॉकटरों ने मेरा जीवन बचाया। और योग ने मुझे सिखाया कैसे उस जीवन को संतुलन, संपूर्णता  और निर्भय होकर जिया जाए।

योग ने मेरी पीड़ा को प्रक्रिया में बदला, और उस प्रक्रिया को… प्रार्थना में। योग मेरे लिए एक “वर्कआउट” नहीं, “वर्क-इन”  है। जहाँ असली परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर होता है। 

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