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औरत शक्ति नहीं, साक्षात परिवर्तन है : डॉ. शिखा नरूला

  • June 19, 2025
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-“सशक्त महिला वो नहीं जो सबसे ज़्यादा बोलती है, बल्कि वो है जो सबसे ज़्यादा बदलाव लाती है, ख़ामोशी से।” -जब औरत अपनी पहचान खुद लिखती है, तो

औरत शक्ति नहीं, साक्षात परिवर्तन है : डॉ. शिखा नरूला

-“सशक्त महिला वो नहीं जो सबसे ज़्यादा बोलती है, बल्कि वो है जो सबसे ज़्यादा बदलाव लाती है, ख़ामोशी से।”

-जब औरत अपनी पहचान खुद लिखती है, तो समाज एक नई किताब पढ़ता है : डॉ. शिखा नरूला

Jagrat Times, Kanpur/ वर्तमान समय में महिलाएं हर क्षेत्र में अपना नाम रोशन कर रहीं हैं। नारी सशक्तिकरण पर अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त करते हुए पटना, बिहार की इवेंट डायरेक्टर, सोशल रिफार्मर व सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. शिखा नरूला ने बताया कि महिला सशक्तिकरण मेरे लिए कोई नारा नहीं है, यह एक भाव है – वो भावना, जो एक लड़की की पहली मुस्कान से शुरू होकर उसकी आत्मनिर्भरता तक पहुंचती है। यह उस समय की पुकार है, जब औरत को सिर्फ देवी बनाकर पूजा नहीं, ज़िंदगी के हर क्षेत्र में बराबरी का हक दिया जाए। मैंने जब-जब एक औरत को चुप देखा है, वहाँ दर्द नहीं — एक तूफान देखा है। जब वो चुप रहती है, तो समाज सोचता है वह कमजोर है, लेकिन सच ये है कि वो अपनी शक्ति को समझने में लगी होती है। और जब वो खड़ी होती है — तो खुद की नहीं, हज़ारों की आवाज़ बन जाती है। सशक्तिकरण क्या है? यह सिर्फ नौकरी करने की आज़ादी नहीं। यह सिर्फ घर से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं। यह है — सोचने की आज़ादी, बोलने का साहस, खुद को पहचानने की हिम्मत, और अपने लिए खड़े होने का आत्मविश्वास।

हर महिला की कहानी एक बदलाव की बीज होती है। वो माँ, जो बेटियों को पढ़ने देती है — वो सशक्त है। वो लड़की, जो ‘ना’ कहने की हिम्मत रखती है — वो सशक्त है। वो विधवा, जो समाज की नजरों से ऊपर उठकर फिर से जीवन चुनती है — वो सशक्त है। वो घरेलू महिला, जो परिवार की नींव बनकर हर रिश्ते को मजबूत करती है — वो सशक्त है। जब एक महिला को उसकी पहचान मिलती है, तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि अपने आसपास की हर लड़की के लिए रास्ता बनाती है। वो सिर्फ कंधे से कंधा नहीं मिलाती, वो ज़रूरत हो तो दूसरों को कंधा भी देती है।
“सशक्त महिला वो नहीं जो सबसे ज़्यादा बोलती है, बल्कि वो है जो सबसे ज़्यादा बदलाव लाती है – ख़ामोशी से।”
मैंने देखा है कि जब किसी मंच पर एक औरत खड़ी होती है, तो सिर्फ उसका परिचय नहीं बदलता — पूरी पीढ़ी का नजरिया बदलता है। एक लड़की जब अपने सपनों के लिए लड़ती है, तो वह सिर्फ खुद को ही नहीं, कई और लड़कियों को उड़ान देती है। मैं एक ऐसी दुनिया देखना चाहती हूँ, जहाँ बेटियाँ जन्म लेने पर बोझ नहीं, उत्सव हों। जहाँ महिला की पहचान रिश्तों से नहीं, उसकी उपलब्धियों से हो। जहाँ हर महिला खुद से प्यार करना सीखे, और कह सके –“मैं काफी हूँ।”
मैं एक महिला हूँ — मैं तोड़ूंगी चुप्पी भी, और सीमाएँ भी। मैं बनूंगी प्रेरणा भी, और आवाज़ भी। मैं झुकी रहूं ये ज़रूरी नहीं — मैं झुकाऊं हर वह सोच, जो मुझे कम समझे, ये ज़रूरी है।
“जब औरत अपनी पहचान खुद लिखती है, तो समाज एक नई किताब पढ़ता है।”

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