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मेरी अटारी का सूरज :- मोनिला शर्मा

  • March 21, 2025
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Jagrat Times, kanpur/ हम जाने कहाँ – कहाँ , कितने पहाड़ों पर कितनी ही मेहनत और कितने ही पैसे ख़र्च करके सूर्योदय देखने जाते हैं । पर ये

मेरी अटारी का सूरज :- मोनिला शर्मा

Jagrat Times, kanpur/ हम जाने कहाँ – कहाँ , कितने पहाड़ों पर कितनी ही मेहनत और कितने ही पैसे ख़र्च करके सूर्योदय देखने जाते हैं । पर ये तो हमारे घर की बालकनी से भी दिखता है और उतना ही ख़ूबसूरत जितना किसी दुर्गम पहाड़ी पर चढ़कर किसी सुसाइड पॉइंट या लव पॉइंट की डरावनी गहराइयों के डर से बेपरवाह । यह पढ़कर पति नामक सांसारिक प्राणी तो ज़रूर ख़ुश हुए होंगे कि काश़ हमारी पत्नी और घर के और सदस्य भी ऐसे ही सोचते तो थोड़ा समय मुझे भी घर में रहने को मिलता अपनी छुट्टी के दिन और पैसे बचते सो अलग । माने हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा आए !
आप सब के होठों पर आयी मंद -मंद मुस्कान को मैं महसूस कर सकती हूँ । पर अगर बात की गहराई को समझा जाए तो जानिये कि ज़रूर यहाँ चिड़ियों की चहचहाहट मिलेगी पर उनका नदियों पर उड़ते उड़ते छपाक से नदी में डुबकी लगाकर उड़ जाना कहाँ मिलेगा। मिट्टी की मोहित कर देने वाली भीनी भीनी सौंधी ख़ुशबू , हमारी बालकनी में आते इंडस्ट्रियल धुएं के ज़हर के सामने सांस भी नहीं ले पायेगी । बेशक़ इस किंक्रीट के जंगल में रोशनी के छोटे छोटे दीये हमारे घर की सोलहवीं -बीसवी फ़्लोर की बालकनी से टिमटिमाते हुए बहूत ही ख़ूबसूरत लगते हैं पर आप सब यह मानेंगे जो मज़ा किसी पहाड़ की गोदी में बसी घाटी में उगी घास पर लेटकर, अपने ऊपर फैली लाखों करोड़ों तारों की चादर में आता है, उस जैसा कोई सुकून नहीं । मुझे पता है आप सब इस समय अपने बचपन की यादों या बीते समय अपने किसी पिकनिक की यादों में खो गए होंगे। शायद मन में यह गीत भी गुनगुनाया रहे होंगे “दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन “

Monila Sharma Jagrat Times

अपनी बालकनी में चाय की चुस्की लेते हुए सूर्योदय के इस मोहक दृश्य को निहारते हुए कभी आपने सोचा आपके साथ, आपके पास कौन है ? जब पलट कर देखते है तो कोई नहीं । आप अकेले खड़े है और सब अपनी रोज़ की दिनचर्या में उलझे है । यह तो रोज़ की होना इससे हम पार नहीं पा सकते । यही हमारी ज़िंदगी है ,पर कुछ समय तो निकाल ही सकते है ।
जब आप अपने परिवार के साथ घूमने जाते हैं समय व्यतीत करते हैं तो आप छोटी – छोटी यादें बनाते हैं बच्चों की जिज्ञासा से भरे मासूम प्रश्न, उनकी आँखों में फैली ख़ुशी की चमक, पहाड़ों पर अपने बच्चों और अपनी पत्नी के साथ रेस लगाना कि कौन पहले उस चोटी तक पहुँचेगा। समुंदर की लहरों का अपने को छूने से पहले उससे बचकर भाग जाना। तितलियों को पकड़ने की झूठी चेष्टा करना और जब उनका रंग आपकी उंगलियों में लग जाए। वाह! वह कितना ख़ूबसूरत होता है । कठफोड़वा, गौरैया, मोर ये पक्षी क्या आपको अपने घर की बालकनी में मिलते हैं ? वहाँ तो हमने कबूतर की जाली लगा रखी है ।क्या बहते पानी में रंग बिरंगी खूबसूरत मछलियाँ बालकनी के आस-पास दिखती ? वो तो हमारे घर के छोटे से अक्वेरियम में क़ैद है । टिमटिमाते जुगनू क्या घर के पास की झाड़ियों में आज भी जगमगाते हैं ? नहीं अब नहीं !
हमे वो यादें चाहिए जो हमारे बच्चों के बचपन से जुड़ जाये और यही वो पल होते हैं जो उन्हें अपनी जड़ो से जोड़ते है । हमें अपने परिवार से जोड़ते हैं हमारे परिवार के सदस्यों को एक दूसरा ही रुप हमारे सामने लाते हैं, जिससे हम परिचित नहीं होते है और जो शायद थ्री बीएचके और फोर बीएचके और ना ही उसकी एक बड़ी सी बालकनी में हम जान पाएंगे ।
आप चाहे कितने भी पौधे अपने आँगन में लगा ले कितने ही ख़ूबसूरत फूल लगा ले , कितने ही बल्ब लगा ले, पर जुगनू की रोशनी , चिड़िया के चहचहाहट , नदियों के पानी की कलकल की आवाज़ का कोई मुक़ाबला नहीं । अपनी अटारी से सूर्योदय तो हम रोज़ देखते हैं पर पहाड़ से निकल कर समुद्र में डूबते हुए सूर्य को देखना सही रूप में , आपकी यादों का, प्रकृति के नैसर्गिक सुंदरता में बिताए गए ख़ूबसूरत लम्हों का , कुछ अनकही कहानियों का एक उपन्यास है।

ज़िंदगी में मानुष-जन्म एक ही बार होता है और जवानी भी केवल एक ही बार आती है। साहसी और मनस्वी तरुण तरुणियों को इस अवसर से हाथ नही धोना चाहिए। कमर बांध लो भावी घुमक्कड़ों ! संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।
-अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा

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