बच्चों को प्रेरित करती गाजियाबाद की मोनिला शर्मा की अद्भुत कहानी-“विनाशकाले विपरीत बुद्धि “
- March 4, 2025
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State Desk, जंगल में अनेक प्रकार के जानवर रहते थे। वहां पर एक गब्बर शेर भी था जिसका नाम जब्बर था और एक भेड़िया जिसका नाम भूरा था।
State Desk, जंगल में अनेक प्रकार के जानवर रहते थे। वहां पर एक गब्बर शेर भी था जिसका नाम जब्बर था और एक भेड़िया जिसका नाम भूरा था। दोनों बहुत अच्छे मित्र थे एक दिन दोनों में बहस हो गई ज्यादा शक्तिशाली कौन है और धीरे-धीरे यह बहस लड़ाई में बदल गई। आखिर में उन्होंने सोचा इसका कोई ना कोई हल तो निकालना पड़ेगा। इतने में क्या देखते हैं कि एक पंडित जी घूमते-घूमते आ गए। उन्होंने सोचा पंडित जी तो बहुत ज्ञानी होते हैं उन्हें इस बात का ज्ञात होगा कि हम दोनों में से कौन ज्यादा शक्तिशाली है। वे दोनों दौड़ते हुए पंडित जी के पास पहुंचे। पंडित जी उन दोनों खतरनाक जानवरों को देख कर डर गए। उनको तो मानो काटो तो खून नहीं । वह तो बुरी तरह भयभीत हो गए और कांपने लगे। परंतु उन्होंने अपने ऊपर संतुलन बनाए रखा और घूर कर भूरा और जब्बर को देखा।
भूरा ने उनसे पूछा,”पंडित जी- पंडित जी, आप तो बहुत ज्ञानी है आपको तो बहुत ज्ञान है। पुराणों का भी, ग्रंथों का भी, तो आप बताइए कि हम दोनों में से कौन ज्यादा शक्तिशाली है।”
जब्बर ने कहा,” हां पंडित जी,आपको बताना पड़ेगा। हम दोनों में इस बात की बहस हो गई है। मैं तो जंगल का राजा हूं पर यह जो है मेरा दोस्त है मुझे राजा नहीं मानता। मेरी शक्ति को भी नहीं मानता। मेरे से बहस करता है तो आप इसको बताइए कि मैं ही ज्यादा शक्तिशाली हूं।”
पंडित जी का तो बुरा ही हाल था। पर उन्होंने सोचा कि यह दोनों मुझे खाने तो नहीं आए हैं। यह तो बस अपनी समस्या का निवारण चाहते हैं तो कुछ ना कुछ दिमाग तो मुझे लगाना पड़ेगा। कोई ना कोई युक्ति लगानी पड़ेगी और अपनी जान तो बचानी पड़ेगी। उन्होंने मन ही मन में एक जुगत लगाई।
उन्होंने ने भूरा और जब्बर से कहा,” यहां से थोड़ी दूर आगे खाई है।जो बहुत बड़ी है अगर तुम दोनों में से कोई एक छलांग में खाई को पार कर जाएगा,वही ज्यादा शक्तिशाली होगा।” यह कह कर पंडित जी मन ही मन मुस्काए,क्योंकि वह खाई दलदल से भरी थी और उनको लगा कि अगर यह दोनों मेरी बातों में आ गए तो मेरी जान तो बच जाएगी और मैं जिंदा अपने घर पहुंच पाऊंगा।
भूरा और जब्बर आपस की लड़ाई के चक्कर में अपनी बुद्धि हार बैठे थे। उनकी बुद्धि पत्थर पड़ गए थे । उन्होंने पंडित जी की चुनौती को स्वीकार कर लिया और दोनों ने जोश में खाई को पार करने के लिए छलांग लगा दी। लेकिन खाई तो दलदल से भरी हुई थी उन्हें यह नहीं मालूम था कि अगर खाई पार ना कर पाए तो वह जिंदा वापस नहीं आएंगे। तो कहते हैं ना विनाश काले विपरीत बुद्धि। बिना कुछ सोचे समझे उन्होंने छलांग लगा दी और जैसा कि होना था वह दोनों दलदल में गिर गए। और अपनी मंदबुद्धि से वीरगति को प्राप्त हुए । पंडित जी भी मुस्कुराते हुए राम-राम करते-करते अपनी जान बचाकर भागे।
